Thursday, August 19, 2010

वो मुझे दोस्त कहता गया
मैं उसके वादो को प्यार समझता गया
झूठी उमीदो पर प्यार की मंजिल खड़ा करता गया
वो करता रहा मुझसे दगा
और मैं नादानी समझता गया
जो था  मेरे पास उसको देने के लिए
उसे बिना बताएं देता गया
 
हम उनसे दिल लगा कर रोये
वो किसी और से दिल लगा कर रोये
रोने का सिलसिला यूहीं चलता रहा
वो हमारा काँधे पर और हम उनके कांधे पर सर रख कर रोये
जिसके लिए चले थे घर छोड़कर हम
दुनिया के रंगीन सपने संजोकर हम
सोचा कदम दर कदम अपनी मोहब्बत का फल्सफा दुनिया को बताएंगे
जीने की एक नयी राह दुनिया को दिखायेंगे
वो जिसके लिए चले थे हम माँ का आंचल छोड़कर
भूल गए थे माँ के दूध का कर्ज
बाप के खून का कर्ज
वो .....वो जब हमसे मिली तो कहने लगी
दिल्लगी की थी हमने तो टीनएज मैं
तुमने दिल की लगी की तो हम क्या करें
जाओ लौट जाओ अपनी जिंदगी मैं और
याद रखना यदि कभी भूले से भी हम नजर आ जाये
तो राह बदल देना तुम अपनी हमें तुम जैसे लोग
से नजर मिलाना पसंद नहीं
जिसके लिए चले थे घर छोड़कर हम
दुनिया के रंगीन सपने संजोकर हम
 
उन्हें अब हमसे मतलब नहीं

जिंदगी का सफर है ये कैसा सफर कोई ..............

कहते है दुनिया गोल है मगर हम अपनी जिंदगी मैं चलते हि रहते है फिर भी मंजिल दूर हि नजर आती है ! हमारी मिरगतृष्णा हमें बहुत दूर ले जाती है और हम दुनिया की भीड़ मैं खो जाते है !